Monday, July 29, 2013

मन - jai Shri Krishna

                                                ६.३४



अर्जुन :-- है कृष्ण ! चुँकी मन चंचल (अस्थिर ) ,हठीला तथा बहुत बलवान है, अत: मुझे इसे बश में करना वायु को बश में करने से भी अधिक कठिन लगता है | 





तात्पर्य:--   मन इतना बलवान तथा दुराग्रही है कि कभी-कभी यह बुद्धि का उल्लंग्घन कर देता है ,   यदपि उसे बुद्धि के अधीन माना जाता है | इस ब्यबहार-जगत् में जहॉ मनुष को अनेक बिरोधी तत्बों संघर्ष करना होता है उसके लिए मन को बश में कर पाना अत्यंत कठिन हो जाता है |



कृत्रिम रूप में मनुष्य अपने मित्र तथा शत्रु दोनों के प्रति मानसिक संतुलन स्थापित कर सकता है, किन्तु अंतिम रूप में कोई भी संसारी पुरुष ऐसा  नहीं कर पाता, क्योंकि ऐसा  कर पाना बेगबान वायु को बश में करने से भी कठिन है |  

"प्रत्येक ब्यक्ति इस भॊतिक शरीर रूपी रथ पर अरुढ है और बुद्धि इसका सारथी है मन लगाम है तथा इन्द्रियाँ घोड़े है इस प्रकार मन तथा इन्द्रियों की संगती से यह आत्मा सुख या दुःख का भोक्ता है | ऐसा बड़े-बड़े चिन्तकों का कहना है   "





यदपि बुद्धि को मन का नियंत्रण करना चाहिए, किन्तु मन इतना प्रबल तथा हठी है की इसे अपनी बुद्धि से भी जीत पाना कठिन हो जाता है जिस प्रकार की अच्छी से अच्छी दबा द्वारा कभी-कभी रोग बश में नहीं हो पाता ऐसे प्रबल मन को योगाभ्यास द्वारा बस में किया जा सकता है , किन्तु ऐसा अभ्यास कर पाना अर्जुन जैसे संसारी ब्यक्ति कभी भी ब्याबहारिक नहीं होता | तो फिर आधुनिक मनुष्य के सम्बन्ध में क्या कहा जाय ? तूफान को रोक पाना कठिन होता है और चनचल मन को रोक पाना और भी कठिन है   मन को बश में  रखने का सरलतम उपाय , जिसे भगबान चेतन्य ने सुझाया है , यह है की हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन किया जाये | बिधि यह है ---- मनुष्य को चाहिए की बह अपने मन को पूर्णता कृष्ण में लगाए | तभी मन को बिचलित करने के लिए अन्य ब्यस्तताऍ शेष नहीं रह जाएँगी |   


                

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