Tuesday, July 23, 2013

आत्मया ज्ञान



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है पार्थ! जो ब्यक्ति यह  जनता है कि आत्मा अबिनाशी , अजन्मा  है , बह भला  किसी को कैसे  मार सकता  है या  मरवा  सकता है ?





तात्पर्य:-- प्रतेक बस्तु  की सुमिचित उपयोग्यता होती है और  वह जनता है की किसी बस्तु का कहा और कैसे प्रयोग किया जाये।

 इसी प्रकार हिंसा की भी अपनी उपयोग्यता है और इसका उपयोग इसे जानने बाले पर निर्भर करता है।  यादापी हत्या करने बाले ब्यक्ति को न्यायसंघिता के अनुसार प्राणदण्ड दिया जाता है, न्यायाधीश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता , क्योंकी वह न्यायसंघिता के अनुसार ही दुसरे  ब्यक्ति पर हिंशा किये जाने का आदेश देता है। मनुषो  के बिधि-ग्रंथ मनुशसंहिता में इसका समर्थन किया गया है की हत्यारे को प्राणदण्ड  देना चाहिए जीससे उसे अगले जीबन में अपना पापकर्म भोगना न परे। अत: राजा द्वारा हात्यारे को फांशी का दण्ड एक प्रकार से लाभप्रद  है। इसी प्रकार जब भगवान कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का आदेश देते है तो यह समझ्ना  चाहिए  की ये हिंशा पारम न्याय के लिए है और इस तरह अर्जुन को इस आदेश का पालन यह समझकर करना चाहिए की कृष्ण के लिये किया गया युद्ध हिंशा नहीं है क्योंकि मनुष्य या दुसरे शब्दों में आत्मा को मारा नहीं जा सकता। अत: न्याय के हेतू तथाकथित हिंशा की अनूमति है। अत: कृष्ण के आदेश पर अर्जुन द्वारा किया जाने बाला युद्ध पूरे ज्ञान के साथ हो रहा अहि है , उससे पापफल की साम्भाबना नहीं है ।

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